रैदास के अनमोल दोहे - 2

रैदास एक ही बूँद से, भयो सब विस्तार।

मुर्ख है जो करे वर्ण अवर्ण विचार॥1॥


तोडू न पाती, पूंजू न देवा।

बिन पत्थर, करें रैदास सहज सेवा॥2॥


मान हरे, धन सम्पत्ति लुटे और मति ले छीन।

राम रम रह्यो हमीं में, बसें कुटुम्भ माहीं॥3॥


जात जात के फेर में उलझ रहे सब लोग।

मनुष्यता को खा रहा, रैदास जात का रोग ॥4॥


जात-जात में जात है, ज्यो केले में पात।

रैदास मानस न जुड़ सके, जब तक जात न जात॥5॥


सौ बरस रहो जगत में, जीवत रह कर करो काम।

रैदास करम ही धरम है, करम करो निष्काम॥6॥


काहे पण्डे तू जपे, राम हरि बारम बार।

तो काहे न होई मुह मीठा, जपे गुड़ हज़ार बार॥7॥


करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस।

कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास॥8॥


रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।

नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच॥9॥


गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी।

चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी॥10॥


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