रैदास के अनमोल दोहे - 1

का मथुरा का द्वारका, का काशी हरिद्वार।

रैदास खोजा दिल आपना, तो मिलिया दिलदार।॥1॥


रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुन हीन।

पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीन॥2॥


जन्म जात कूँ छांडि करि, करनी जात परधान।

इह्यौ बेद को धरम है, करै रविदास बखान॥3॥


राम कहत सब जग भुलाना सो यह राम न होई।

जा रामहि सब जग जानत भरम भूलै रे भाई॥4॥


जब पाया पीया नहीं, था मन में अभिमान।

अब पछताए होत क्या नीर गया मुल्तान॥5॥


कहें रैदास सुनो भाई सन्तों, ब्राह्मण के है गुण तीन।

मान हरे, धन सम्पत्ति लुटे और मति ले छीन॥6॥


रैदास कहें जाके ह्रदै, रहै रैन दिन राम।

सो भगता भगवंत सम, क्रोध न ब्यापै काम॥7॥


जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास।

प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास॥8॥


रैदास तूँ कावँच फली, तुझे न छीपै कोइ।

तैं निज नावँ न जानिया, भला कहाँ ते होइ॥9॥


रैदास राति न सोइये, दिवस न करिये स्वाद।

अह-निसि हरिजी सुमिरिये, छाड़ि सकल प्रतिवाद॥10॥


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